Best Collection Of Short Love Stories In Hindi Font

हिंदुस्तान में इश्क़ पर्सनल लेवल का इंक़लाब होता है –
किताबों और फिल्मों के Idealism, Romanticism और Cynicism के बीच जब दो अलग ज़मात, ज़ात और धर्म के लोग हाथों में हाथ डाले, दिल में घबराहट लिए किसी AC मॉल में घूमते हैं तो इस देश में कुछ बदलने की उम्मीद दिखती है। ये हर उस “पर हमारे माँ-पिता नहीं मानेंगे” के बाद “हम कोई रास्ता निकाल ही लेंगे” के साथ थोड़ा-थोड़ा बदलता है।
हिंदुस्तान CCD और Barista में हर कॉफ़ी के साथ बेहतर हो रहा है। DU की कैंटीन और Patna के गांधी मैदान के बाहर लिट्टी-चोखा की रेहड़ी पे बदल रहा है और बदलाव लाने वाले वो हैं जो कई किलोमीटर दूर बैठे अपने महबूब से मिलने के लिए कोशिशें करते हैं। ज़माने के ख़िलाफ़ जाकर बहुत-सी जुर्रतें करते हैं।
वो जो अपने Surname को अपने इश्क़ के आड़े नहीं आने दे रहे। वो जो गुरूद्वारे जाते-जाते मस्जिद के आगे भी सर झुका रहे हैं। वो जो किसी और की ख़ुशी के लिए उसकी ज़ुबां के मुश्किल से मुश्किल लफ्ज़ सीख रहे हैं। वो जो किसी और शहर में किसी के साथ एक शाम बिताने के लिए शुक्रवार को जल्दी निकलते हैं और सोमवार को ऑफिस आने में थोड़ा लेट हो जाते हैं। वो जो जब सास-ससुर को मनाने निकलते हैं तो पहला चैलेंज ये होता है कि रास्ते में TT को भी मनाना है।
वो जो रोडवेज़ के कालजयी सफ़र को एक फ़ोटो के सहारे ख़ुशी-ख़ुशी निकाल देते हैं। वो जो सेहरा पहनने के लिए कफ़न पहनने को तैयार हो जाते हैं। वो जो कायस्थ हैं पर हिसाब का खाता उनका ब्राह्मण के घर है। वो जो अपने इश्क़ के लिए अपने होने वाले बच्चों का ‘रिजर्वेशन’ ठुकरा रहे हैं।
वो जो ख़राब सड़कों से जूझते इस देश में मुंह फेर के खड़े मुल्क के किन्हीं दो कोनों को अपने इश्क़ से एक-दूसरे के होने का एहसास करवा रहे हैं। वो जो पटना को जयपुर ले के जा रहे हैं। वो जो अहमदाबाद में अपने चाँद को देखने गोरखपुर से जाते हैं। वो जो लखनऊ के गोश्त को हैदराबाद की बिरयानी से मिलवा रहे हैं। वो जो मुज़फ्फरपुर को अज़मेर घुमा रहे हैं।
दरअसल इश्क़ हदों में रह कर नहीं होता। इश्क़ में जब कोई आसमां में किसी और पतंग से पेंच लड़ाता है तो किस छत गिरेगा ये उसके बस में नहीं होता। पर हिंदुस्तान में इश्क़ पर्सनल लेवल का इंक़लाब होता है जिसमें अपनों की रज़ामंदी के लिए अपने निजी विश्व-युद्ध लड़े जाते हैं।
सोच के देखिये कि कोई कैसे गाली देगा किसी ‘मुल्ले’ को जब वो मामा होगा रिश्ते में, कि कोई कैसे किसी ‘ख़ाकी निक्कर’ वाले से दूर रहेगा अगर बुआ बिहाई होगी उस घर में, कि कोई कैसे ‘चमयार’ को गाली समझेगा अगर बीवी भी उस कुल की होगी… क्योंकि नफ़रत से दिमाग बदलते हैं, दिल नहीं।
..क्योंकि लिबरल कोई अख़बार, किताब और JNU नहीं, इश्क़ बनाता है…….