Best Collection Of Short Love Stories In Hindi Font

तुम उसके चेहरे से नीचे नहीं देखते थे। चुनरी सरक जाती थी, तब भी नहीं। जो कंपकपी थी न उसके हाथ से पहली दफ़ा हाथ छू जाने पे… शराफ़त थी वो तुम्हारी। मूंछों के साथ जो मासूमियत भी रही है अब तक चेहरे पे तुम्हारे, उसे बचा के रखना। आँखों में जो शर्म रही है तुम्हारे, उसे भी।
रूमी वाले इश्क़ और ओशो वाले प्यार का Average हो तुम। दोनों को समझने वाले।
दूसरा वाला हमारे देश में क्लासरूम के आख़िरी बेंच पे Re-production के Chapter और Tuition में दोस्त के Memory Card में 15 MB की वीडियो से भी सीखा जाता है या रेल के डिब्बे में रात के अँधेरे में ऊपर वाली बर्थ पे लेट कर सस्ती मैगज़ीन से उसका ज्ञान ग्रहण किया जाता है।
पहला वाला (रूमी वाला) बहुत कम और किस्मत वालों को प्रैक्टिकली समझ आता है। तुम्हें आ गया इसलिए इश्क़ में नाकामयाब होने का मलाल मत रखना। उस बात का भी मलाल मत रखना कि जब हाथ में अपना CV होता था पर नुक्कड़ के मंदिर से गुज़रने पर ख़ुदा से नौकरी नहीं, उसे मांगते थे। तुम जैसे लोग थिएटर के आख़िरी Row की कोने वाली सीट से ज़्यादा JNU की सड़क पे लंबी वॉक पे जाने के ख़्वाब देखते हैं।
तुम कछुए हो। खरगोश नहीं। तुम्हारा वक़्त अभी आया ही नहीं।
पर यही तो इश्क़ का क्रैश कोर्स था पगले। उसके बहाने नुसरत की क़वाली के मायने समझ आने लगे हैं। ये क्या कम फ़ायदे की बात है?
हाँ, हो सकता है कि नुक्कड़ पे खड़े लौंडों के इश्क़ के पैमानों पे तुम आशिक़ ना समझे जाओ, ना सही। वो ‘तेरे नाम’ और ‘डर’ को याद रखते हैं। तुम भूल जाते हो। अच्छा करते हो। तुम ‘वीर-ज़ारा’ और ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ को याद रखते हो। अच्छा करते हो।
क्योंकि लूज़र और फट्टू के कसे हुए ताने कुछ ही साल तुम्हारा दम घोंटेंगे। दरहसल, 22 की ग्रेजुएशन, 24 की पोस्ट ग्रेजुएशन, 25 की जॉब स्विच, 26 की प्रमोशन और 28 की उम्र में शादी के प्रेशर के वक़्त जब माँ-बाप अपनी लड़की के लिए लड़का ढूंढेंगे या जब लड़की अपने लिए खुद लड़का ढूंढेगी तो … उस नुक्कड़ पे तंज कसते लड़कों की ER आ जायेगी और यही तुम्हारी ज़िन्दगी का Merit है।
क्योंकि लौंडों और अच्छे लड़कों का फर्क यही है। दरहसल, जवानी पे इतना फोकस है बाज़ार और फ़िल्मों का कि Rebel और Rowdy के बीच जवानी कहीं फंस जाती है। और शराफ़त Boring दिखने लगती है और यहीं कहीं पे Mumma’s Boy, लास्ट बेंच वाले Play Boy से हार स्वीकार कर लेता है और Hero की साइकिल Honda की Bike से पीछे रह जाती है।
बेवकूफ़ी है उस फ़िल्म में सलमान ख़ान को देखना और उस कहानी का Climax तय करती किरण खेर, फ़रीदा जलाल और रीमा लागू को भूल जाना क्योंकि ज़िन्दगी के इस दौर की सबसे बड़ी सच्चाई इस सवाल में है कि –
“खुद की बहन के लिए खुद जैसा लड़का ढूंढना है या नहीं ?”
क्योंकि जब लड़की का बाप तुम्हारे मोहल्ले में अपनी लड़की के लिए योग्य-वर की तफ़्तीश करने निकलेगा तो तब तुम Flying Colours से पास होगे, वो चरस फूँकता लौंडा नहीं।
इसलिए, अच्छा हुआ कि बर्फ के टुकड़े की तरह तुम ओल्ड मोंक के पेग में घुल नहीं गए और बाबा भोलेनाथ के प्रसाद के साथ हवा में उड़ नहीं गए (किसी-किसी रात को चलता है)।
क्योंकि आज के दौर में लड़कों की प्रजाति के Endangered Specie हो तुम। सुबह के अख़बार में फ्रंट पेज पे छपने वाली Rape की ख़बरों के Antidote हो तुम। Demand तो असल में तुम्हारी है। Economics के ‘Demand & Supply’ वाले चश्मे से देखोगे तो जल्दी समझ जाओगे।
तुमने जवानी बचा ली है। मुबारक हो। देखो, तुम जीत गये। देखो, कछुए हमेशा जीत जाते हैं…….