Best Hindi Short Story collections of all time
Best Short Story

Best short story collections of all time in hindi – is post me aap ko bahut si tpye ki heart touching short stories padhne ko milengi. jo pyar ke upar hain samaj ke upar hain, friendship ke upar bhi.. ummeed hai ki aap ko pasand ayengi.

13गुलाब (STORY)

शहर में वो नया-नया आया था। एक भली सी शहरी लड़की को दिल भी दे बैठा । किस्मत साथ थी तो कहानी मुलाकातों तक बढ़ चली। दोनों ही अक्सर खाने-पीने साथ जाते। उन्हें साउथ इंडियन बेहद पसंद था। उस बेचारे को छुरी-कांटों से खाने में बहुत उलझन होती थी। इस्तेमाल करने नहीं आते थे तो संकोच भी होता था लेकिन अपनी बनावटी कस्बाई हनक में शर्म छिपाता था। अक्सर तन कर कहता- हम तो ऐसे ही हैं। लड़की बेचारी बिना छुरी-कांटे के खा नहीं पाती थी। बहरहाल प्रेमिका की सोहबत में आखिर कब तक अकड़ा रहता सो छुरी-कांटे से खाने की ट्रेनिंग लेने लगा। दोनों साथ घूमते-फिरते.. फिर भूख लगने पर शहर के अच्छे रेस्तरां में जाया करते। कोने की टेबल पर बैठ लड़की छुरी-चम्मच से झटपट डोसे का पोस्टमॉर्टम जैसा कर देती.. वो उसे हौले-हौले फॉलो करता। इस दौरान लड़के की कोशिश रहती कि उसकी कवायद देख कोई पहचान ना ले कि उसे छुरी-कांटे का इस्तेमाल नहीं आता। एक दिन यही सब करते-करते कांटा हाथ से छूट नीचे जा गिरा। शांत सी दोपहर में सबका ध्यान दो पल के लिए उनकी तरफ चला गया। काफी देर तक वो झेंप में यूं ही बैठा रहा। उस दिन के बाद उसने फिर कभी छुरी- कांटे नहीं उठाए। रेस्तरां तो दोनों अब भी जाते हैं… मालूम चला है कि अब लड़की हाथों से डोसा खाती है….

12प्रेम v.३.५ (STORY)

खाना खा लेने के बाद बिल आ चुका था… उसने हाथ पर्स निकालने के लिए बढ़ाया. वो समझ गई और झट से बिल चुकाने की फरमाइश की. “अरे नहीं, मैं दे रहा हूं”- शायद खाने का न्यौता खुद देने की वजह से उसने अपने को मेज़बान माना था या फिर मुमकिन है कि एक लड़का होने के नाते बिल चुकाने का अहसास उसके मध्यमवर्गीय संस्कारों की देन था. जो भी हो वो नहीं माना. गुलाब जानती थी कि अभी एक रास्ता और है. उसने पेशकश की- ” तो चलो आधा-आधा चुकाते हैं. मैं और मेरे दोस्त ऐसा ही करते हैं”
“करते होंगे.. मैं नहीं करता. या तो पूरा चुकाओ या फिर कुछ भी नहीं”- लापरवाही से उसने जवाब दिया…
मालूम नहीं किसने बिल दिया लेकिन उसके बाद कई बार वो खाने पर साथ गए.. जिसने भी पैसे दिए पूरे ही दिए, आधे-आधे नहीं. दोस्ती से कुछ ज़्यादा रिश्ते पर ये अपनी ही तरह की मुहर थी….….

11अलविदा (STORY)

ट्रेन आखिरी सीटी दे चुकी थी… गुलाब ना चाहते हुए भी अब खड़ी ही हो गई। उसके हाथ से अपना हाथ छुड़ाने लगी मगर वो छोड़ने को तैयार नहीं था। बस हाथ पकड़े हंसता ही जा रहा था। इधर गुलाब की आंखों से मोती झर रहे थे…. कतार थी कि रुकती ही नहीं थी। वे सब देख रहा था लेकिन बेवजह हंसे जा रहा था। गुलाब ने फिर पूछा- तुम वैसे तो इतना हंसते नहीं थे लेकिन आज क्यों हंस रहे हो?
वो कुछ नहीं बोला..बस हंसने की बजाय मुस्कुराने लगा। दोनों जानते थे कि शायद आज के बाद एक-दूसरे को नहीं देख पाएंगे…. गुलाब ट्रेन में जाकर खिड़की के पास बैठ गई.. उसने फिर से हाथों में हाथ थाम लिया। ट्रेन चल पड़ी..वो भी ट्रेन के साथ आहिस्ता-आहिस्ता चलने लगा। गुलाब आंसू भरी आंखों से उसे एकटक देखे जा रही थी और वो हंस रहा था। गुलाब ने फिर पूछा- क्यों हंस रहे हो तुम..मत हंसो..
फिर हाथ छोड़ते हुए उसने इतना ही कहा- पता नहीं अब कभी हंस सकूंगा या नहीं.. आखिरी बार था गुलाब.. विदा मेरी जान….
वाकई उसके चेहरे पर अब मुस्कुराहट का कोई निशां भी नहीं था.. मानो वो सदियों से इस पत्थर जैसे चेहरे के साथ जी रहा हो……….

10कुछ कहानी कुछ किस्से (STORY)

तुम गली से निकलती और मैं पीछे से आता. कुछ दूर चलने के बाद तुम्हें बाइक पर बैठाकर हम रफ्तार पकड़ लेते. तब वो बाइक घोड़े से कम नहीं लगती थी. मैं पृथ्वीराज जैसे अहसास के साथ तुम्हें अपनी संयोगिता मानकर बाइक को रेस देता चलता. लगता था मानो जमाने को पीछे छोड़ दिया और अब कभी लौटना नहीं होगा. ज़रा शहर की जद से बाहर निकले तो खुद ही तुम्हारी बाहें पकड़कर अपनी कमर तक ले आता. तुम सकुचाती थी पर मैं मानता कहां था. हालांकि घर वापस लौटते हुए हम उतने ही उदास होते थे. उदासी जितनी गहराती थी तुम्हारी बाहों की कसावट उतनी ही बढ़ती जाती थी.

9प्रेम (STORY)

वो मेहंदी लगवा रही थी. वो भी पास बैठा था.उसकी गोरी हथेलियों पर मेहंदी की कीप बेहद सावधानी से चल रही थी. आसपास भरे बाज़ार से दोनों ही बेसुध थे. हर कुछ देर बाद मेहंदी वाला हाथ उठाता और एक खूबसूरत अक्स उभरता. दोनों एक-दूसरे को देख मुस्कुराने लगते. हाथ आधा ही रचा था मगर वो मेहंदी से उठ रही खुशबू से मदहोश हुई जा रही थी. बच्चों की तरह किलकती हुई अपना हाथ उसे सुंघाने के लिए बार-बार आगे बढ़ाती. यही दोनों का खेल बन गया. अब दोनों वहां नहीं हैं.. कोई और यही खेल खेलता होगा…..

8( STORY)

“नाराज़ नहीं हूँ और माफ़ी की आवश्यकता नहीं तुम्हें, मुझे कोई शिकायत नहीं तुमसे… तुम परेशान मत हो.. पिछली मुलाक़ात में तुममें बाक़ी बचा मेरा हर हिस्सा वापस ले आया हूँ… हाँ, अपने काजल से तुमने, मेरे कान के पीछे जो काला टीका लगाया था न बस उसे ही छोड़ आया हूँ… यूं तो अब उसकी ज़रूरत नहीं मुझे… इसलिए बस इतना करना कि साथ देखे गए बाक़ी सपनों को दफ़नाते वक़्त उसे भी मिट्टी में दफ़न कर देना…”

7(STORY)

अगले ही पल मैं दरगाह के दर पे खड़ा था, जहां अपनी-अपनी मन्नतों में एक-दूसरे को बांध आए थे हम.. अब वहाँ से तुम्हें आज़ाद भी तो करना था न… मन्नत के रंगीन धागे को खोलते वक़्त पिछला सारा मंज़र निगाहों के सामने घूम रहा था… वो मंदिर भी जहां साल शुरू होने की दूसरी तारीख़ को साथ गए थे दोनों और जब मत्था टेका था तो अनजाने में ही पंडित ने दोनों को साथ ही सुखी रहने का आशीर्वाद दे दिया था….. ख़ैर, मैंने एक लंबी सांस भरी और धागा खोल तुम्हें आज़ाद किया.. हाँ, मगर ख़ुद को बंधा ही छोड़ दिया उस धागे में जिसे तुमने मेरे नाम से बांधा था.. उसे भी खोलूँगा तब, जब अपने आख़िरी वक़्त में तुमसे आख़िरी दफ़ा मिलने आऊंगा……

6हिंदुस्तान में इश्क़ पर्सनल लेवल का इंक़लाब होता है – (STORY)

किताबों और फिल्मों के Idealism, Romanticism और Cynicism के बीच जब दो अलग ज़मात, ज़ात और धर्म के लोग हाथों में हाथ डाले, दिल में घबराहट लिए किसी AC मॉल में घूमते हैं तो इस देश में कुछ बदलने की उम्मीद दिखती है। ये हर उस “पर हमारे माँ-पिता नहीं मानेंगे” के बाद “हम कोई रास्ता निकाल ही लेंगे” के साथ थोड़ा-थोड़ा बदलता है।
हिंदुस्तान CCD और Barista में हर कॉफ़ी के साथ बेहतर हो रहा है। DU की कैंटीन और Patna के गांधी मैदान के बाहर लिट्टी-चोखा की रेहड़ी पे बदल रहा है और बदलाव लाने वाले वो हैं जो कई किलोमीटर दूर बैठे अपने महबूब से मिलने के लिए कोशिशें करते हैं। ज़माने के ख़िलाफ़ जाकर बहुत-सी जुर्रतें करते हैं।
वो जो अपने Surname को अपने इश्क़ के आड़े नहीं आने दे रहे। वो जो गुरूद्वारे जाते-जाते मस्जिद के आगे भी सर झुका रहे हैं। वो जो किसी और की ख़ुशी के लिए उसकी ज़ुबां के मुश्किल से मुश्किल लफ्ज़ सीख रहे हैं। वो जो किसी और शहर में किसी के साथ एक शाम बिताने के लिए शुक्रवार को जल्दी निकलते हैं और सोमवार को ऑफिस आने में थोड़ा लेट हो जाते हैं। वो जो जब सास-ससुर को मनाने निकलते हैं तो पहला चैलेंज ये होता है कि रास्ते में TT को भी मनाना है।
वो जो रोडवेज़ के कालजयी सफ़र को एक फ़ोटो के सहारे ख़ुशी-ख़ुशी निकाल देते हैं। वो जो सेहरा पहनने के लिए कफ़न पहनने को तैयार हो जाते हैं। वो जो कायस्थ हैं पर हिसाब का खाता उनका ब्राह्मण के घर है। वो जो अपने इश्क़ के लिए अपने होने वाले बच्चों का ‘रिजर्वेशन’ ठुकरा रहे हैं।
वो जो ख़राब सड़कों से जूझते इस देश में मुंह फेर के खड़े मुल्क के किन्हीं दो कोनों को अपने इश्क़ से एक-दूसरे के होने का एहसास करवा रहे हैं। वो जो पटना को जयपुर ले के जा रहे हैं। वो जो अहमदाबाद में अपने चाँद को देखने गोरखपुर से जाते हैं। वो जो लखनऊ के गोश्त को हैदराबाद की बिरयानी से मिलवा रहे हैं। वो जो मुज़फ्फरपुर को अज़मेर घुमा रहे हैं।
दरअसल इश्क़ हदों में रह कर नहीं होता। इश्क़ में जब कोई आसमां में किसी और पतंग से पेंच लड़ाता है तो किस छत गिरेगा ये उसके बस में नहीं होता। पर हिंदुस्तान में इश्क़ पर्सनल लेवल का इंक़लाब होता है जिसमें अपनों की रज़ामंदी के लिए अपने निजी विश्व-युद्ध लड़े जाते हैं।
सोच के देखिये कि कोई कैसे गाली देगा किसी ‘मुल्ले’ को जब वो मामा होगा रिश्ते में, कि कोई कैसे किसी ‘ख़ाकी निक्कर’ वाले से दूर रहेगा अगर बुआ बिहाई होगी उस घर में, कि कोई कैसे ‘चमयार’ को गाली समझेगा अगर बीवी भी उस कुल की होगी… क्योंकि नफ़रत से दिमाग बदलते हैं, दिल नहीं।
..क्योंकि लिबरल कोई अख़बार, किताब और JNU नहीं, इश्क़ बनाता है…….

5(STORY)

तुम उसके चेहरे से नीचे नहीं देखते थे। चुनरी सरक जाती थी, तब भी नहीं। जो कंपकपी थी न उसके हाथ से पहली दफ़ा हाथ छू जाने पे… शराफ़त थी वो तुम्हारी। मूंछों के साथ जो मासूमियत भी रही है अब तक चेहरे पे तुम्हारे, उसे बचा के रखना। आँखों में जो शर्म रही है तुम्हारे, उसे भी।
रूमी वाले इश्क़ और ओशो वाले प्यार का Average हो तुम। दोनों को समझने वाले।
दूसरा वाला हमारे देश में क्लासरूम के आख़िरी बेंच पे Re-production के Chapter और Tuition में दोस्त के Memory Card में 15 MB की वीडियो से भी सीखा जाता है या रेल के डिब्बे में रात के अँधेरे में ऊपर वाली बर्थ पे लेट कर सस्ती मैगज़ीन से उसका ज्ञान ग्रहण किया जाता है।
पहला वाला (रूमी वाला) बहुत कम और किस्मत वालों को प्रैक्टिकली समझ आता है। तुम्हें आ गया इसलिए इश्क़ में नाकामयाब होने का मलाल मत रखना। उस बात का भी मलाल मत रखना कि जब हाथ में अपना CV होता था पर नुक्कड़ के मंदिर से गुज़रने पर ख़ुदा से नौकरी नहीं, उसे मांगते थे। तुम जैसे लोग थिएटर के आख़िरी Row की कोने वाली सीट से ज़्यादा JNU की सड़क पे लंबी वॉक पे जाने के ख़्वाब देखते हैं।
तुम कछुए हो। खरगोश नहीं। तुम्हारा वक़्त अभी आया ही नहीं।
पर यही तो इश्क़ का क्रैश कोर्स था पगले। उसके बहाने नुसरत की क़वाली के मायने समझ आने लगे हैं। ये क्या कम फ़ायदे की बात है?
हाँ, हो सकता है कि नुक्कड़ पे खड़े लौंडों के इश्क़ के पैमानों पे तुम आशिक़ ना समझे जाओ, ना सही। वो ‘तेरे नाम’ और ‘डर’ को याद रखते हैं। तुम भूल जाते हो। अच्छा करते हो। तुम ‘वीर-ज़ारा’ और ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ को याद रखते हो। अच्छा करते हो।
क्योंकि लूज़र और फट्टू के कसे हुए ताने कुछ ही साल तुम्हारा दम घोंटेंगे। दरहसल, 22 की ग्रेजुएशन, 24 की पोस्ट ग्रेजुएशन, 25 की जॉब स्विच, 26 की प्रमोशन और 28 की उम्र में शादी के प्रेशर के वक़्त जब माँ-बाप अपनी लड़की के लिए लड़का ढूंढेंगे या जब लड़की अपने लिए खुद लड़का ढूंढेगी तो … उस नुक्कड़ पे तंज कसते लड़कों की ER आ जायेगी और यही तुम्हारी ज़िन्दगी का Merit है।
क्योंकि लौंडों और अच्छे लड़कों का फर्क यही है। दरहसल, जवानी पे इतना फोकस है बाज़ार और फ़िल्मों का कि Rebel और Rowdy के बीच जवानी कहीं फंस जाती है। और शराफ़त Boring दिखने लगती है और यहीं कहीं पे Mumma’s Boy, लास्ट बेंच वाले Play Boy से हार स्वीकार कर लेता है और Hero की साइकिल Honda की Bike से पीछे रह जाती है।
बेवकूफ़ी है उस फ़िल्म में सलमान ख़ान को देखना और उस कहानी का Climax तय करती किरण खेर, फ़रीदा जलाल और रीमा लागू को भूल जाना क्योंकि ज़िन्दगी के इस दौर की सबसे बड़ी सच्चाई इस सवाल में है कि –
“खुद की बहन के लिए खुद जैसा लड़का ढूंढना है या नहीं ?”
क्योंकि जब लड़की का बाप तुम्हारे मोहल्ले में अपनी लड़की के लिए योग्य-वर की तफ़्तीश करने निकलेगा तो तब तुम Flying Colours से पास होगे, वो चरस फूँकता लौंडा नहीं।
इसलिए, अच्छा हुआ कि बर्फ के टुकड़े की तरह तुम ओल्ड मोंक के पेग में घुल नहीं गए और बाबा भोलेनाथ के प्रसाद के साथ हवा में उड़ नहीं गए (किसी-किसी रात को चलता है)।
क्योंकि आज के दौर में लड़कों की प्रजाति के Endangered Specie हो तुम। सुबह के अख़बार में फ्रंट पेज पे छपने वाली Rape की ख़बरों के Antidote हो तुम। Demand तो असल में तुम्हारी है। Economics के ‘Demand & Supply’ वाले चश्मे से देखोगे तो जल्दी समझ जाओगे।
तुमने जवानी बचा ली है। मुबारक हो। देखो, तुम जीत गये। देखो, कछुए हमेशा जीत जाते हैं…….

4वो चिट्ठियां जिनके पते नहीं (STORY)

कुछ चिट्ठियां कभी सही पते पर नहीं पहुंच पातीं। वो भटकने के लिए अभिशप्त होती हैं। मुमकिन है कि देर-सवेर कभी सही चौखट मयस्सर हो भी जाती हो मगर चिट्ठी का संबंध प्रासंगिकता से होता है। अगर लेट हो गई तो फिर उसकी कीमत घट जाती है…कई बार तो खत्म हो जाती है। पिछले दिनों एक ऐसी ही चिट्ठी मिली। मंजिल से दूर और वक्त से छिटकी हुई। मैं नहीं जानता कि वो मुझे जहां मिली वहां तक पहुंची कैसे। जुबान होती तो शायद बोलकर बताती। अब तो उसे उलट-पुलटकर बस अंदाजा लगा सकते हैं सो मेरे साथी और मैं लगाते रहते हैं। मेरा दिल है कि आपको उसके बारे में बताऊं।
पिछले शनिवार की बात है। मुंबई में घूमते-घामते एक पुरानी किताबों की दुकान पर पहुंचे। ना जाने कहां-कहां से पुरानी किताबें वहां शरण पाती हैं और फिर एकाध दिन सुस्ताने के बाद किसी ना किसी के हाथ बिक जाती हैं। हमारे हाथ भी एक किताब लगी। किताब के कवर पेज पर अभिषेक बच्चन थे। जाहिर है कि किताब फिल्मों पर आधारित थी। विषयवस्तु जानने की इच्छा में किताब को उलटा-पलटा। इसी देखादेखी में पाया कि एक गुलाबी लिफाफा दो पन्नों के बीच चिपका है। प्यार-सा छोटा लिफाफा बंद नहीं था। एक चिट्ठी उसमें से बाहर झांक रही थी।
blog_14547यही है वो किताब जिसमें सौमित्रा की चिट्ठी मिली।
9 साल पहले बंगाल के मालदा से लिखी गई वो चिट्ठी एक रिटायर्ड रेलवे कर्मचारी की बेटी सौमित्रा ने लिखी थी। चिट्ठी लिखने के तरीके से मालूम पड़ता है कि साढ़े 17 साल की सौमित्रा जवान होती सपनों से भरपूर जिंदादिल लड़की है। टूटी फूटी अंग्रेजी में सौमित्रा ने 25 मार्च 2006 को वो पाती अभिषेक बच्चन को लिखी है। हम सबको याद है उस दौर में अभिषेक दर्शकों की तरफ से अस्वीकार्य किए जाने के बाद सफल कम बैक कर रहे थे। उनकी ‘युवा’, ‘बंटी और बबली’ और ‘सरकार’ आ चुकी थी जबकि ‘कभी अलविदा ना कहना’ का इंतज़ार था। सौमित्रा अभिषेक को बेहद प्यार करने का दावा करने के साथ शादी करने की जल्दी में है। इसके पीछे एक वजह वो जतिंद्र बनर्जी भी है जिसे सौमित्रा के पिता उसके लिए पसंद कर चुके हैं।
जतिंद्र भारी मूंछे रखने वाला दूधिया है। सौमित्रा को लगता है कि वो उसे रेपिस्ट की तरह घूरता है। उसे अभिषेक की ’ब्लफमास्टर’ सबसे ज्यादा पसंद है जिसे उसने चिट्ठी लिखने तक 35 बार देखा है और गोल्डन जुबली का वादा है। सौमित्रा को ‘वन लव’ गाना बहुत पसंद आया मगर वो ये नहीं समझ पा रही कि मुंबई की ‘बेशर्म’ और ‘संस्कारहीन’ लड़कियां अभिषेक के पीछे क्यों पड़ी रहती हैं। ऊपर से वो इतने छोटे कपड़े पहनती हैं कि सौमित्रा को उन्हें टीवी पर देखकर भी शर्म आती है। सौमित्रा अभिषेक को रानी मुखर्जी और ‘ओशोजा’ रॉय से शादी ना करने के लिए भी मना रही है। उसका मानना है कि रानी बंगाली होने के नाते कुछ ठीक तो है मगर वो खुद उससे काफी बेहतर है। खत के आखिर में वो अभिषेक को ये भी बताती है कि वो अपने दिल की बातें खून से लिखना चाहती थी मगर क्या करे.. उसे सुई से डर लगता है।
लिफाफे पर पता था- Abisek Bochchon, Film Star, Jalsa Juhu Mumbai । एक कोने में तीर से दिल छिदा था और आई लव यू भी लिखा था।
मैं जहां खड़ा होकर उस चिट्ठी को पढ़ रहा था ‘जलसा’ वहां से तकरीबन 8 किलोमीटर दूर है। ये भी जानता था कि दरअसल वो दूरी 8 किलोमीटर से बहुत ज़्यादा है। ना होती तो वो चिट्ठी 9 साल तक ना भटकती रहती। फिर याद आया 90 के दशक में दूरदर्शन पर आया एक धारावाहिक जिसमें एक डाकिया कुछ चिट्ठियां पते पर पहुंचाए बिना मर जाता है। उसका बेटा 20 साल बाद उन सभी चिट्ठियों को उनके सही पतों तक पहुंचाता है लेकिन तब तक वक्त बहुत आगे निकल चुका होता है। हर चिट्ठी के पहुंचने के बाद एक अलग ही कहानी उपजती है। इसी तरह सौमित्रा की चिट्ठी को मालदा से चले 9 साल बीत गए हैं। नहीं मालूम कि उस उत्सुक सी लड़की का क्या हुआ। मन है कि मालूम करूं। मूंछों वाले जतिंद्र से वो बच भी सकी या फिर अब वही उसका ‘अभिषेक बच्चन’ है।
(पहचान छिपाने के लिए चिट्ठी के पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं)

3(STORY)

हाथ में बोतल लटकाए स्कूल से घर के लिए लौटता तो उसके पीछे- पीछे वो कुत्ता भी चला आता. पूंछ हिलाता कुत्ता उसके दांए-बाएं चलता रहता.. वो भी मस्ती में अपना रास्ता नापता. कभी-कभी वो उस कुत्ते को बेवजह एक लात भी जमा देता. जिस दिन कुत्ता उसके पास नहीं आता तो पुचकार कर उसे लात जमाने के लिए बुला लेता. लात लगने के बाद कुत्ता कांय-कांय करता तो ना जाने उसे क्या मज़ा आता. फिर उसे इस हिंसा में एक अजीब सा आनंद आने लगा. एक दिन उसे वो कुत्ता रास्ते में नहीं दिखा.. अगले दो दिन तक भी नहीं मिला. वो उसे लात मारने के लिए परेशान था. संयोग से क्लास में टीचर ने कुत्ते की एक कहानी सुनाई. उसे अब अपना कुत्ता याद आने लगा. वो बेचैन था. लात मारने का मन था. घर लौटते हुए उसने कुत्ते को खोजना शुरू किया तो कुत्ते ही नहीं दिखे. रास्ते में पान वाले से पूछा तो पता चला कि म्यूनिसिप्लिटी वाले सभी को गाड़ी में बंद करके बड़े मैदान ले गए. वो पैदल ही बड़े मैदान के लिए चल पड़ा. मैदान पहुंचा तो देखा एक कोने में बड़े से दो पिंजरों में ढेरों कुत्ते भौंक रहे थे. वो अपना कुत्ता खोजते हुए एक पिंजरे के पास पहुंचा. पाया कि वही कुत्ता उसके पास आने के लिए मचल रहा था. उसने देखा वहां कोई नहीं था. पिंजरे के पास जा कर थोड़ी मशक्कत की तो कुंडी भी खुल गई. दरवाज़ा खुलते ही बीसियों कुत्ते कमान से तीर की तरह छूट कर भागे. उसके वाला मगर कहीं नहीं भागा.. वो पूंछ हिलाता हुआ उससे लात खाने के लिए पास चला आया.. मगर वो ना जाने क्यों आज लात मारने के मूड में नहीं था. प्यार से उसकी गरदन पर हाथ फेर रहा था..

2(STORY)

बाज़ार सजा था। धूप भी खूब तेज़ थी।चूंकि भीड़ बहुत नहीं थी इसलिए ज़्यादातर दुकानदार सुस्ता रहे थे।इसी बीच सड़क पर एक आदमी चला जा रहा था. अचानक उसके एक पैर में दूसरा पैर उलझा और वो गिर पड़ा। बेचार ने तेजी से इधर-उधर देखा और संभल कर उठ खड़ा हुआ। लोग उसी की तरफ देख रहे थे। हाथ झाड़कर वो आगे बढ़ा ही था कि अचानक फिर से वही हुआ। दूसरा पैर पहले में अटका और वो वहीं ढेर हो गया। इस बार पूरे बाज़ार में ज़ोर का ठहाका गूंजा। खुद को बेइज़्ज़त सा महसूस कर वो बेचारा इस बार हौले से खड़ा हुआ। आस्तीन से माथा पोंछा और ज्यों ही आगे बढ़ा कि फिर….
किसी ने हंसते हुए पूछा- अबे कौन है ये… इसके दोनों पैरों की ही आपस में नहीं बन रही मियां..
मैंने कहा- तुम्हारा ही मुल्क है.. गौर से तो देखो….

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1नीम का पेड़ (STORY)

पिताजी ज़िंदा थे तब तक वो उस नीम के पेड़ को हाथ भी नहीं लगा सका था. गाड़ी पेड़ की वजह से अहाते में ठीक से खड़ी नहीं हो पाती थी. हजार तर्क दे कर वो हार गया कि नीम के कटने के बाद अहाते में थोड़ी जगह निकल आएगी. गाड़ी भी ठीक से खड़ी हो पाएगी. नीम से टूटे पत्तों को रोज़-रोज़ साफ करने की मेहनत भी बचेगी. कोई तर्क हो मगर पिताजी के लिए वो नीम नहीं बल्कि हमउम्र साथी था जिसकी रक्षा करना उनका फर्ज़ जैसा कुछ हो गया था. रोज नई वजह लाता पर पिताजी टस से मस नहीं होते थे. वो पिताजी को बहुत चाहता था लेकिन उनके अड़ियल रुख से बहुत चिढ़ता था. हर रात पत्नी से शिकायत करता कि गाड़ी ठीक से अहाते में खड़ी नहीं हो पाती. बेकार में ही नीम ने जगह घेरी हुई है. फिर एक दिन पिताजी अहाते में ही घूमते हुए गश खाकर गिर पड़े. नीम के सामने ही उनकी जान चली गई. ठीक तेरह दिन बाद ऐसा अंधड़ चला कि नीम टूटकर गिर गया. उसने किसी को बुलाकर ठूंठ तक कटवा दिया. अब जगह थी. गाड़ी ठीक से खड़ी होती थी. कभी -कभी पिताजी बहुत याद आते थे. मां उसे पैदा करते ही चल बसी थी तब से पिताजी ने ही तो पाला था. यूं ही 20 साल गुज़र गए.. अब पिताजी की याद रोज आने लगी. एक सुबह पत्नी ने देखा कि वो अहाते में मिट्टी खोद रहा है. करीब गई तो देखा वो नीम बो रहा था.
( संदर्भ से अलग, प्रसंग से जुदा)

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